कलंक
- Half Papyrus

- Jul 9, 2020
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की राज मैंने खुद से यू रखे कई
धोखा तुझसे यूं करता हूं।
उस रात बड़ा था यह जुल्म हुआ, शायद कहने में डरता हूं।
मैंने सुनी थी वो चीखें जो सारी नगरी में गूंजी थी जब ,जब शहर के हर कोने में छुपती लाशें जो रहती घर घर।
फिर एक कहीं, फिर एक कही आवाज आई मुझे
लगा कि तू बच जाएगी अब
वो बैठ निकले कोने में देख रहे थे तमाशा तब।
यह आंख खुदा तुम नोच लो इनकी इसको अनदेखा करते हैं,
ये कहते खुद को मर्द है साले,
ये नीच बलात्कार करते हैं।
की वो रात बड़ी ही काली थी-२
बस बर्बरता ही वाली थी
कोई वैशी कुत्तों ने उस दिन वो करने की ठानी थी,
कि बहक गए हैं हम यारों अब तो बस एक उपाय दिखे,
कि जो मिल जाए एक भी नारी देह उसका एक बार
चखे।
जब हाथ पड़े हो उस रोजो पर और झपट रहा था निक्कमो पर।
वो सांप सा रीर सा रेंग रहा था वैश्यी उसकी जांघो
पर,
जब कमर वो पकड़े हाथों से और केश खींचता जोरो से और बीच चौराहे पर लटका देता वह टूटे बिखरे देखो तब। फिर तेल डालकर माटी का माचिस की गाड़ी फेक
चला,
और हम जैसे ही चुप थे अबतक आतंक का अब ये दौर चला।
हा भौक रहा था सन्नाटा, आज छींक रही थी रुकसाना।
गंदगी पीली रात में उस दिन,
रात को हआ था हंगामा,
जब भाई हमारा कोई उसको वहां बचाने पहुंचा था
दिल्ली याद करिए
जब भाई हमारा कोई उसको वहां बचाने पहुंचा था
वो खून सा लथपथ टूटा बेशक बेबस अस्पताल पहुंचा था।
जब शहर के सूरज के उगने में बस कुछ ही घंटे बाकी थे,
वह भाई हमारा जो छोड़ गया, क्या हम जैसे ही पापी थे।
तो अब जो है कृष्ण जी आ गए द्रौपदी को बचा लिया, अब बचाने वाला कोई नहीं। कृपया अपनी
सुरक्षा खुद करे। अब में लड़कियों से कहना चाहूंगी के अब वो क्या करे
कि पहले एक, फिर दो हो गए
मैंने सुना है वह अब कई और हो गए
कल उजड़ा था एक का दामन
आज यह किस्से सौ हो गए।
रोज़ रोज़ इं अख़बारों में खून सना ये पाता हूं।
में टूट चुका हूं सुन सुन कर और बेबस खुद को पता
हूं।
की राह चलती को-२
एक बार नहीं, हर बार बचाने जाऊंगा
जो हुए हैं घर में दानव यारों, उन से कैसे बचा लूंगा।
तब कहता हूं सुनो द्रौपदी-२
चुप मत बैठो आज उठाओ बाण जरा,
प्रतिंशा गांडीव चड़ाओ छाती पे जो आज ज़रा
अरे कलयुग है ये
अरे कलयुग है ये ओ बहन सुनी अब माधव ना आएंगे, ये समय नहीं है सही ज़रा मै कहदू अब माधव ना आएंगे।
अरे अब खुद काली अवतार धरो
और रक्त की तुम बरसात करो
छुए जो कोई तिनका भर भी, हाथ काट ओंकार भरो।
अरे आग भरो तुम जुबान में अपनी , राख करो उन दानव को
और उठा तलवार और देख कटार चीर फाड़ दो रावण को।
अब ये सभी लड़कों के लिए
कि अब फिर देखो यूं नारी को छोटे-छोटे वस्त्रों में
यह नजर तुम्हारी झुक ना जाए सोच गिरा दो गड्ढों में,
जब शाम अकेले मदिरा संग वो भाव दिलों में आ जाए
इस देह को अपनी आग लगा दो अंश भी तुम में रह ना जाए।
अब एक नहीं सब साथ कहो-२
की गलत काम ना आज से हो अब
अरे अब हम जैसे हैं जिंदा अब तक ,एक ही जिंदा ख्वाब हो तब
की फिर अब एक भी नारी ऐसी मारी जाएगी,
मैं कह देता हूं सुन लो यारो, अब तो शामत आ जाएगी।
हां वो दोषी को आज नहीं तो कल डालेंगे सलाखों में-२
इसके पहले मार मार के हलक सुखा दो रातों में।
हां गलत है यह मालूम मुझे-२
नहीं हक देता कानून मुझे
पर एक बार यह सोचो की बर्बरता क्या सही थी ये!
हां न्याय मिलेगा जानता हूं
क्या इतनी प्रतीक्षा सही है ये?
अरे रोज़ रोज़ इं हत्यारों को भोजन सारा देते रहे,
ये देह भोगी को कब तक हम यूं कमरे में ये बेड़े रहे,
व्यक्ति बदल सकता है किंतु सोच को कैसे बदलोगे
जो हुआ है आसाराम उसे राम में कैसे बदलोगे।
अब आखिर में बस ये की,
जब भी फिर इतिहास के पन्ने कलयुग में लिखे जाएंगे,
तुम करो आज कुछ ऐसा कि वह तुम्हें भूल ना पाएंगे,
तय करना है एक उदाहरण -२
की इंकलाब फिर आएगा,
और आर्यव्रत की इस धरती पर राम राज्य फिर आएगा।
फिर देखो इन गलियों में हर रात दिवाली आएगी,
हर भोर संग अपने होली के हर रंग लाएगी
हर मंदिर मस्जिद चैन से अपनी दुआ सलाम कबुलेगा
कोई कोर्ट कचहरी में सुनने ऐसे मसले ना पहुंचेगा।
हर बहन बेटी शीष उठाए चल देंगी सम्मानों से,
हर भोर भरेगी सपनों से
हर आंख भरी अरमानों से।
हर युग में तुमने नाम तुम्हीं ने परचम पर लहराया है
हर युग में तुमने दानव को चंडी रूप अपना दिखाया है।
तुम याद रखो कि किस कुल की हो तुम, किस देवी
का अंश हो तुम?
मां काली का रूप हो तुम! मणिकर्णिका का वंश हो
तुम!
अब सिर्फ दो लाइन मौन पड़ी हर सांसों को बस एक बात यह सिखला दो-२
हर ऐसे दोषी को अब बस लाल किले पर लटका दो।



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